Hidma 15 घंटे तक Twitter पर ट्रेंड में क्यों रहा? टॉप नक्सल कमांडर की मौत से दिल्ली तक मचा सियासी भूचाल

Hidma 15 घंटे तक Twitter पर ट्रेंड में क्यों रहा? टॉप नक्सल कमांडर की मौत से दिल्ली तक मचा सियासी भूचाल

कौन हैं हिडमा, और अचानक 15 घंटे तक सोशल मीडिया पर छा क्यों गए?

अगर आप रविवार–सोमवार के बीच X (Twitter) पर एक्टिव रहे होंगे, तो आपकी टाइमलाइन पर एक नाम बार–बार ज़रूर दिखाई दिया होगा – Hidma या Madvi Hidma। कई लोगों के लिए यह नाम नया था, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए वह पिछले दो दशकों से देश के सबसे खतरनाक नक्सल कमांडरों में से एक माना जाता था।

हिडमा 2025 के नवंबर महीने के बीच में आंध्र प्रदेश के जंगलों में हुए एक बड़े एन्काउंटर में मारे गए, लेकिन असली सोशल मीडिया तूफान कुछ दिन बाद तब उठा जब दिल्ली में एयर पॉल्यूशन के खिलाफ हुए एक प्रदर्शन में अचानक “मदवी हिडमा अमर रहे” के नारे और उनके पोस्टर दिखाई दे गए। यहीं से #Hidma, #MadviHidma और #IndiaGateProtest जैसे हैशटैग एक के बाद एक trend करने लगे।

मदवी हिडमा कौन था? दंतेवाड़ा से जिरम तक खून से लिखी गई फाइल

मदवी हिडमा छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके का आदिवासी युवक था, जो किशोर उम्र में ही CPI (Maoist) की People’s Liberation Guerrilla Army (PLGA) से जुड़ गया। आगे चलकर वह Dandakaranya Special Zonal Committee का हिस्सा बना और फिर Central Committee तक पहुंचने वाले गिने–चुने आदिवासी नेताओं में शामिल हो गया – यह पद आमतौर पर तेलंगाना या पुराने hardcore कैडर के लिए आरक्षित माना जाता था।

सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक हिडमा की कमान वाले Battalion No.1 पर पिछले 15 साल के कई सबसे भयानक हमलों की जिम्मेदारी रही – 2010 का दंतेवाड़ा हमला (76 CRPF जवान शहीद), 2013 का जिरम घाटी नरसंहार (कांग्रेस नेताओं पर हमला), 2017 का बुरकापाल attack, और 2021 का सुकमा–बीजापुर एम्बुश जिसमें 20 से ज़्यादा जवान शहीद हुए। उन पर 40–50 लाख तक का इनाम अलग–अलग राज्यों और NIA की ओर से रखा गया था।

18 नवंबर का एन्काउंटर: कैसे खत्म हुई “घोस्ट ऑफ़ बस्तर” की कहानी

18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू ज़िले के मरेडुमिल्ली जंगल में Greyhounds (आंध्र की स्पेशल फोर्स) और सुरक्षा बलों ने एक joint operation में हिडमा को मार गिराया। पुलिस के मुताबिक यह ऑपरेशन लगभग चार घंटे तक चला और इसमें हिडमा, उसकी पत्नी और चार अन्य नक्सली मारे गए।

खबर यह भी सामने आई कि intelligence agencies ने करीब 34 घंटे तक उसकी मूवमेंट पर नज़र रखी, उसके बाद multi‑tier घेरा बनाकर encounter launch किया गया, ताकि कोई भाग न सके। बरामद हथियारों में दो AK‑47, पिस्तौल, रिवॉल्वर और विस्फोटक सामग्री शामिल बताई गई। गृह मंत्री अमित शाह ने इस ऑपरेशन को “नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में निर्णायक मोड़” बताते हुए बलों को बधाई दी।

“शाह की डेडलाइन से 12 दिन पहले”: राजनीतिक narrative भी गरमाया

रिपोर्ट्स में यह जानकारी भी आई कि कुछ महीने पहले हुई एक high-level meeting में गृह मंत्री ने सुरक्षा एजेंसियों को हिडमा को 30 नवंबर तक neutralise करने का टार्गेट दिया था – और वह 18 नवंबर को ही मारा गया। इस बात को सरकार समर्थक circles ने ऑपरेशन की planning और intelligence क्षमता के तौर पर पेश किया।

हालांकि कुछ विपक्षी नेताओं और rights activists ने सवाल उठाए – क्या हिडमा surrender की तैयारी में था? क्या encounter “staged” हो सकता है? बस्तर के कुछ स्थानीय राजनीतिक बयानों ने आग में घी डालने का काम किया, जिसमें कहा गया कि अगर कोई surrender करना चाहे और उसे रास्ता न मिले तो बाकी Maoist cadre का भरोसा टूट सकता है।

15 नक्सलियों का सरेंडर: ज़मीन पर क्या बदला?

हिडमा की मौत के कुछ ही दिनों के भीतर छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में 15 सक्रिय नक्सलियों ने पुलिस के सामने सरेंडर किया, जिन पर कुल 48 लाख रुपये का इनाम घोषित था। surrender करने वालों में चार hardcore सदस्य वही Battalion No.1 के बताए गए, जिसे कभी हिडमा लीड करता था। पुलिस और प्रशासन ने इसे “बस्तर में shifting ground” का संकेत बताया।

बस्तर रेंज के IG ने कहा कि सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं, मोबाइल नेटवर्क और livelihood योजनाओं की वजह से अब remote गांव भी main administration से जुड़ रहे हैं। उनकी दलील थी कि लोग “डर और isolation” से निकल रहे हैं और Maoist ideology की पकड़ ढीली पड़ रही है, इसीलिए surrender और intelligence input दोनों बढ़े हैं।

Delhi Pollution Protest से अचानक कैसे जुड़ गया हिडमा का नाम?

अब असली सवाल – नक्सल कमांडर की मौत और बस्तर के एन्काउंटर का नाम दिल्ली की सड़कों और Twitter trends तक कैसे पहुंच गया? दरअसल 23–24 नवंबर को दिल्ली के इंडिया गेट–C Hexagon इलाके में toxic air और AQI के खिलाफ एक प्रदर्शन के दौरान अचानक माहौल बदल गया।

जैसे ही पुलिस ने भीड़ को तितर–बितर करने के लिए chilli spray और pushback का इस्तेमाल किया, वहीं कुछ प्रदर्शनकारियों के हाथ में मदवी हिडमा के पोस्टर और बैनर देखे गए। कई वीडियो क्लिप्स में “मदवी हिडमा अमर रहे” और “Long Live Comrade Hidma” जैसे नारे सुनाई दिए। यही क्लिप्स कुछ ही घंटों में X और Instagram पर viral हो गए – और यहीं से #Hidma ट्रेंड शुरू हो गया।

BJP बनाम विपक्ष: “प्रदर्शन या नक्सल रोमांटिस्म?”

सोशल मीडिया पर ruling party के नेताओं ने तुरंत यह narrative उठाया कि दिल्ली के air pollution विरोध में शामिल कुछ लोग असल में “urban Naxal” agenda push कर रहे हैं। एक press conference में BJP प्रवक्ताओं ने आरोप लगाया कि “जो लोग देश के खिलाफ हथियार उठाने वाले को शहीद बता रहे हैं, वे असल मुद्दा नहीं, हिंसक विचारधारा को glorify कर रहे हैं।”

विपक्षी दलों और कई नागरिक समूहों ने जवाब में कहा कि पूरे protest को कुछ नारे लगाने वाले लोगों की वजह से बदनाम करना गलत है; बड़ी संख्या में लोग सिर्फ साफ हवा की मांग लेकर आए थे। कुछ ने यह भी सवाल उठाया कि क्या नारेबाज़ी करने वाले लोग genuine protesters थे या किसी ने जानबूझ कर प्रदर्शन को derail करने के लिए ऐसे पोस्टर और नारे बीच में डाले।

Twitter/X पर 15 घंटे का तूफान: दो ध्रुव, दो narrative

जैसे ही Delhi protest के क्लिप्स वायरल हुए, X पर #Hidma, #MadviHidma और #DelhiProtests लंबे समय तक trend करते रहे। एक धड़ा security forces और सरकार को support करते हुए लिख रहा था – “26 हमलों का मास्टरमाइंड, सैकड़ों मौतों का जिम्मेदार, उसे ‘अमर रहे’ कहना insult है शहीद जवानों का।” इस narrative में ऑपरेशन के details, परिवारों की तस्वीरें और शहीदों के नाम–सूची शेयर की जा रही थी।

दूसरी ओर कुछ left-leaning और activist हैंडल्स हिडमा को class–struggle, tribal exploitation और state violence के larger context में fit करते हुए बातें कर रहे थे – हालांकि खुले समर्थन से ज़्यादातर अकाउंट बचते दिखे। debate का बड़ा हिस्सा इस पर था कि क्या किसी भी सशस्त्र विद्रोही को romantic poster‑icon बनाना उचित है, खासकर ऐसे attacks के बाद जिनमें आम जवान और चुने हुए जनप्रतिनिधि मारे गए हों।

बस्तर का ground, दिल्ली की timeline: disconnect या dangerous link?

कई senior journalists और security analysts ने इस बात पर चिंता जताई कि शहरों में बैठकर बिन–संदर्भ के slogans लगाना, बस्तर जैसे conflict zones में ground workers और आम आदिवासियों के लिए risk बढ़ा सकता है। उनके मुताबिक जब एक तरफ सरकार surrender और rehabilitation का रास्ता खोलने की बात कर रही है, दूसरी ओर अगर urban circles में हिंसक आदर्शों को heroic तरीके से पेश किया जाएगा, तो confused cadre गलत messsage ले सकते हैं।

इसके विपरीत, कुछ activists ने तर्क दिया कि हिडमा का नाम लेना दरअसल state की policies पर सवाल उठाना है – जैसे alleged fake encounters, land rights और displacement के मुद्दे। लेकिन यह argument भी एक सवाल से नहीं बच पाया – क्या ऐसी critique किसी दूसरे symbol या language के ज़रिए नहीं की जा सकती थी, जो सीधे mass‑killings से जुड़ा न हो?

क्या हिडमा की मौत से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा?

Central और state agencies इस encounter को “last nail in the coffin” की तरह पेश कर रही हैं, लेकिन experienced observers थोड़ा guarded optimism रखते हैं। top leadership का मारा जाना Maoist movement के लिए बड़ा झटका ज़रूर है – खासकर south Bastar belt में, जहां Hidma का influence बहुत strong था। surrender की नई लहर और development projects का असर भी दिख रहा है।

लेकिन decades‑old insurgency सिर्फ एक व्यक्ति पर टिकी नहीं होती। local grievances, जमीन–जंगल के सवाल और governance gaps अगर पूरी तरह address नहीं हुए, तो नए leaders उभरने की संभावना बनी रहती है। experts का कहना है – “Hidma का end symbolic जीत है, structural जीत तभी होगी जब बस्तर के आम युवा की पहली पहचान बंदूक नहीं, कॉलेज, job और business हो।”

फिलहाल social media का verdict क्या कहता है?

अगर सिर्फ trend और tone देखें तो 15 घंटे तक चला Hidma वाला social media storm इस बात का संकेत है कि internal security और ideology के मुद्दे अब सिर्फ ground पर नहीं, इंटरनेट पर भी लड़े–लिखे जा रहे हैं। बहुत से आम users, जिन्हें पहले बस्तर या नक्सल हिंसा का background नहीं पता था, उन्होंने पहली बार Hidma का नाम सुना – कभी dreaded कमांडर के रूप में, कभी किसी के पोस्टर पर छपे “कॉमरेड” के रूप में।

यह ट्रेंड remind कराता है कि hashtags की ताकत सिर्फ awareness बढ़ाने तक सीमित नहीं; गलत symbols और आधे‑अधूरे facts अगर वायरल हो जाएं, तो complex conflicts और ज़्यादा धुंधले हो सकते हैं। शायद इस पूरे episode से सीख यही है कि protest हो या पोस्ट, दोनों में जिम्मेदारी और संदर्भ उतने ही ज़रूरी हैं, जितना passion और गुस्सा। वरना कल किसी और नाम के trending होने पर हम फिर यही पूछते रहेंगे – “ये अचानक खबरों और timeline में कैसे छा गया?”