Justice Surya Kant क्यों ट्रेंड कर रहे हैं? 2025 में सुप्रीम कोर्ट के लिये turning point
सोशल मीडिया पर अचानक Justice Surya Kant, CJI Surya Kant और #SupremeCourt2025 जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे तो बहुत से लोगों का पहला सवाल था – “ऐसा क्या बड़ा हो गया?” वजह सिर्फ एक judgement नहीं, बल्कि एक पूरा दौर है। Justice Surya Kant अभी‑अभी भारत के 53वें Chief Justice of India के रूप में शपथ ले चुके हैं, और उनकी अब तक की journey और key फैसलों ने मिलकर judiciary को 2025 की national conversation के centre में ला खड़ा किया है।
छोटे शहर के वकील से लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत के मुखिया बनने तक का उनका सफर, Article 370 से लेकर sedition law, electoral transparency, Pegasus spyware, corruption और free speech जैसे मुद्दों पर दिए गए फैसले – सब मिलकर ये दिखा रहे हैं कि आने वाले 15 महीनों में Supreme Court का रुख और तेवर काफी हद तक CJI Surya Kant के विज़न से तय होगा।
53वें CJI के रूप में शपथ: छोटा कस्बा, बड़ी जिम्मेदारी
Justice Surya Kant ने 23 नवंबर 2025 को 53वें Chief Justice of India के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल लगभग 15 महीने का होगा, यानी फरवरी 2027 तक वे देश की न्यायपालिका के शीर्ष पद पर रहेंगे। इससे पहले वे पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से उठकर हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के Chief Justice बने, और फिर Supreme Court judge के रूप में 300 से ज़्यादा benches में बैठकर फैसले सुना चुके हैं।
शपथ से पहले ही उन्होंने दो बातों पर साफ फोकस जताया – Supreme Court में pendency यानी pending मामलों की संख्या (90,000 से ज़्यादा) घटाने की कोशिश और Constitution Benches को priority देकर बड़े संवैधानिक सवालों पर clarity लाना। साथ ही, वे mediation को “game changer” और system की बड़ी समस्याओं का practical solution मानते हैं।
Article 370 पर ऐतिहासिक फैसला: special status खत्म करने के पक्ष में
Justice Surya Kant जिस फैसले की वजह से सबसे ज्यादा चर्चा में आए, उनमें से एक है Article 370 वाला judgement। वे उस bench का हिस्सा थे जिसने केंद्र सरकार द्वारा जम्मू–कश्मीर का special status हटाने और राज्य को केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फैसले को constitutional माना।
इस judgement ने federalism, संसद की powers और राज्यों के अधिकारों पर लंबी बहस छेड़ी। समर्थकों ने इसे national integration की दिशा में मजबूत कदम कहा, तो आलोचकों ने इसे state autonomy पर सवाल बताया। लेकिन कानून की भाषा में Supreme Court ने साफ कर दिया कि Parliament के पास J&K के reorganisation और Article 370 हटाने की पर्याप्त शक्ति है।
Sedition law पर brake: colonial धारा पर सुप्रीम ब्रेक
Justice Surya Kant उस bench का भी हिस्सा रहे जिसने colonial era की sedition धारा (IPC 124A) पर historic रोक लगाते हुए कहा कि जब तक सरकार खुद इस कानून की समीक्षा नहीं कर लेती, तब तक इस धारा के तहत कोई नया FIR दर्ज नहीं किया जाएगा और पुराने मामलों में भी सख्त नज़र रखी जाएगी।
इस फैसले को free speech और dissent के हक में एक बड़ा कदम माना गया। भारतीय लोकतंत्र में “देशद्रोह” शब्द का राजनीतिक इस्तेमाल लंबे समय से विवादित रहा है; ऐसे में Supreme Court का यह मैसेज कि colonial कानूनों पर बिना सोचे–समझे निर्भर नहीं रहा जा सकता, youth, activists और legal community में काफी सराहा गया।
Electoral transparency और Bihar voter list: चुनाव आयोग से tough सवाल
नए CJI चुनावी पारदर्शिता के मामलों में भी assertive रहे हैं। वे उस bench में शामिल थे जिसने Bihar में electoral rolls की special intensive revision पर सवाल उठाए और Election Commission से पूछा कि 65 लाख voters कैसे draft से बाहर हो गए। Court ने ECI को इन voters की details disclose करने और process को साफ करने के निर्देश दिए।
Electoral bonds scheme को असंवैधानिक ठहराने वाली bench में भी वे शामिल रहे, जिसने कहा कि anonymous corporate funding transparency और voters के right to know के खिलाफ है। इन दोनों फैसलों से साफ संदेश गया कि Supreme Court चुनावी प्रक्रिया को केवल “political question” मानकर छोड़ने को तैयार नहीं, बल्कि voters के अधिकारों को लेकर serious है।
Pegasus, surveillance और privacy: “judicial mind” की ज़रूरत
Justice Surya Kant उस bench का हिस्सा रहे जिसने Pegasus spyware मामले में independent committee बनाकर जांच के आदेश दिए। Court ने कहा कि surveillance और privacy के ऐसे sensitive मामलों पर सिर्फ सरकार के internal inquiry पर भरोसा नहीं किया जा सकता, यहां “judicially trained mind” की नज़र ज़रूरी है।
इसी तरह वे उस bench में थे जिसने 2022 में प्रधानमंत्री की Punjab यात्रा के दौरान हुई security breach पर Justice Indu Malhotra कमेटी नियुक्त की। message साफ था – national security से जुड़े सवालों पर भी court अपनी constitutional भूमिका निभाने से पीछे नहीं हटेगा।
Free speech, stand-up comedy और ministers के बयान: “ज़ुबान की भी जिम्मेदारी है”
नए CJI free speech के प्रबल समर्थक माने जाते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी कहा – “freedom of speech is not a licence to flout societal norms.” Ranveer Allahbadia (BeerBiceps) और stand‑up comics के एक show में दिव्यांग लोगों पर की गई derogatory comments के मामले में उनकी bench ने साफ warning दी और Centre से online content regulation के लिए guidelines लाने को कहा।
इसी तरह, मध्य प्रदेश के एक मंत्री द्वारा सेना की महिला officer Col Sofiya Qureshi पर की गई टिप्पणी पर Justice Surya Kant की bench ने फटकार लगाते हुए कहा कि किसी मंत्री के हर शब्द में जिम्मेदारी reflected होनी चाहिए। यानी court के लिए free speech important है, लेकिन hate speech, body shaming या vulnerable groups के खिलाफ मज़ाक को open licence नहीं माना जा सकता।
Corruption और “caged parrot” CBI: सिस्टम को आईना
2023 के एक बड़े फैसले में Justice Surya Kant ने corruption को “serious societal threat” बताते हुए CBI को 28 बड़े मामलों की जांच का आदेश दिया, जिनमें banks और developers की “unholy nexus” से homebuyers को भारी नुकसान हुआ था। यह इशारा था कि financial fraud को सिर्फ civil dispute नहीं, सामाजिक अपराध की तरह देखा जाए।
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal को CBI excise policy case में bail देते हुए उनकी bench ने famously कहा कि CBI को “caged parrot” की image से बाहर आकर truly independent agency के तौर पर काम करना होगा। यह लाइन quickly political और legal circles में quote बन गई और आज भी agency independence की बहस में reference दी जाती है।
Gender justice, domestic workers और bar में women quota
Justice Surya Kant कई gender justice मामलों में भी progressive रुख अपनाते दिखे हैं। उन्होंने एक महिला sarpanch को वापस पद पर बहाल करते हुए lower authorities की gender bias पर कड़ी टिप्पणी की। साथ ही, Supreme Court Bar Association सहित bar bodies में कम से कम 1/3 seats महिलाओं के लिए reserve रखने का निर्देश भी उनके नाम से जुड़ा हुआ है।
Domestic workers के मामले में उनकी bench ने माना कि यह workforce सबसे ज़्यादा vulnerable है और इनके लिए कोई clear legal framework नहीं है। Court ने Centre को expert committee बनाकर domestic workers के अधिकारों और सुरक्षा के लिए कानून बनाने की दिशा में कदम उठाने को कहा – ये step लाखों अनऔपचारिक कामगारों के लिए important precedent बन सकता है।
नया CJI, नया फोकस: backlog, mediation और “केवल Supreme Court ही सब नहीं”
शपथ लेने से पहले Justice Surya Kant ने साफ कहा कि Supreme Court में 30 साल से लंबित मामलों तक हैं, और उनका priority list में सबसे ऊपर काम होगा – ऐसी cases को तेजी से निपटाना। वे मानते हैं कि litigants का trend सीधे Supreme Court आने का बढ़ गया है, जिससे हाई कोर्ट और district courts पर विश्वास कमज़ोर होता है; वे इस imbalance को address करना चाहते हैं।
वे mediation को जोर‑शोर से promote कर रहे हैं – banks, corporates और MNCs तक court से अपने in‑house mediators को train करवाने की मांग कर रहे हैं। CJI Kant का मानना है कि कई commercial और civil disputes अगर समय रहते mediation से हल हो जाएं, तो अदालतों पर बोझ भी घटेगा और parties का संबंध भी कम टूटेगा।
2025 का बड़ा संदेश: Judiciary under spotlight – उम्मीदें भी, सवाल भी
Justice Surya Kant के CJI बनने और उनके पुराने landmark verdicts फिर से viral होने से 2025 में judiciary एक बार फिर national spotlight में है। एक तरफ लोग उनके Article 370, sedition, electoral reforms और free speech से जुड़े फैसलों को progressive और bold मान रहे हैं; दूसरी तरफ यह भी देख रहे हैं कि backlog, lower judiciary की हालत, judge appointments और digital justice जैसे मुद्दों पर वे क्या actual बदलाव ला पाते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि आने वाले महीनों में Supreme Court से जुड़े हर बड़े मामले – चाहे वह चुनावी पारदर्शिता हो, federalism, नागरिक अधिकार या tech regulation – में CJI Surya Kant का नाम बार‑बार सुर्खियों में रहेगा। छोटे शहर से उठकर देश की सबसे बड़ी अदालत की कुर्सी तक पहुंचने वाले इस न्यायाधीश के लिए अब असली परीक्षा यही है कि वे system को सिर्फ अच्छे शब्दों से नहीं, measurable बदलावों से भी यादगार बना पाएं।
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